श्री आदिगुरु पीठ एक परिचय

सत्य सनातन धर्म:-

सनातन - सदा + ट्युल्, तुट् नि० दस्य नः जो नित्य है अनादि है स्थायी है इस प्रकार, सनातन शब्द का अर्थ है जो शाश्वत और सार्वभौमिक है जो सदा रहने वाला है।
धर्म शब्द "घृ" धातु से बना है जिसका अर्थ है धारण करना। "
"धारयति इति धर्म:" अर्थात वह सिद्धांत जो धारण करने योग्य है।
यतो अभ्युदय निःश्रेयस सिद्धिः सधर्मः।
(कणाद,वैशेषिकसूत्र,1.1.2)
"वह जिससे अभ्युदय ( लौकिक उन्नति) और निःश्रेयस (पारलौकिक कल्याण) प्राप्त हो , वही धर्म है।"

धर्मादर्थ: प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम
धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत
वाल्मीकरामायण ३/९/३०
धर्म से अर्थ प्राप्ति होती है धर्म से सुख होता है धर्म से सब कुछ प्राप्त होता है यह सारा जगत धर्म का सार है। धर्म का मूल वेद है -

"वेदो अखिलो धर्म मूलम्" - "वेद ही सभी धर्मों का मूल है।"
वेदो नारायण: साक्षात् स्वयम्भूरिति शुश्रुम
और वेद स्वयं भगवान के स्वरूप है वे उनके स्वाभाविक श्वास प्रश्वास एवं स्वयं प्रकाशरूपी ज्ञान ही है।

वेदप्रणिहितो धर्मोह्यधर्मस्तद्विपर्यय:
श्रीमद्भागवत ६/१/४०
वेदों ने ( भगवान ने ) जिन कर्मों का विधान किया है वे धर्म हैं और जिनका निषेध किया है वे अधर्म है।
जब जब अधर्म बढ़ता है और धर्म का ह्रास होता है तो भगवान अपनी विभिन्न शक्तियों के साथ वैदिक धर्म के रक्षार्थ और भक्तों को आनंद प्रदान करने हेतु धरा धाम पर अवतरित होते रहते है। सृष्टि के आदिकाल में प्रलय के समय जब सब नष्ट हो जाता है तो सनातन ज्ञान ज्योति को बीज रूप में सुरक्षित रखते है फिर कालांतर में पुनः सृष्टि सृजन के समय आदिगुरु बनकर प्रकट कर देते है ये क्रम निरंतर प्रवाहमान रहता है। इस प्रकार यह सनातन धर्म सदा से है और सदा ही रहने वाला है। यही सबका आदि धर्म है।

श्री आदिगुरु :-

आदिगुरु दो शब्द से बना है आदि और गुरु - आदि: "आद्" धातु से बना है, जिसका अर्थ है "आरंभ " अर्थात प्रथम । "गु माने अंधकार, रु माने प्रकाश " गुरु" का अर्थ है जो अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाए।
आदिगुरु से अभिप्राय प्रथम गुरु जिन्होंने ज्ञान रूपी ज्योति प्रकट कर अज्ञान रूपी अंधकार तिमिर को ध्वंस करके कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। वहीं ज्ञान राशि सृष्टि के आदिकाल से शिष्य प्रशिष्य परम्परा द्वारा निरंतर प्रवाहित हो रही है।
सृष्टि की रचना संबंधी कथाओं में कल्पभेद के कारण कुछ भिन्नता दिखाई पड़ती है। परंतु तत्व ज्ञान से स्पष्ट हो जाता है कि वह तत्व, वह मूल शक्ति तो एक ही है जो भिन्न भिन्न देवी देवताओं के रूप में प्रकट होकर सृष्टि के सृजन पालन और संहार की प्रकट अप्रकट लीला करती है। वह आद्य शक्ति ही सबका मूल है इसलिए ही तो भगवान कहलाने वाले श्रीमन नारायण, स्वयं भगवान शिव आदि समस्त देवी देवता भी अनंतानंत कोटि ब्रह्माण्ड नायिका श्री माता राजराजेश्वरी भगवती श्री ललिता महात्रिपुर सुंदरी की आराधना करके शक्ति से सम्पन्न होकर अपना अपना कार्य करते है। सभी को प्रथम ज्ञान राशि प्रदान करने वाली तो मां ही होती है इसलिए जगजननी जगदम्बा ही सबकी आदिगुरु है।

कालांतर में कल्प भेद से सृष्टि के आदि काल में भगवान नारायण के नाभी कमल से भगवान ब्रह्मा जी प्रकट हुए और तप किया जिससे भगवान नारायण ने प्रसन्न होकर उनको तत्त्व ज्ञान ( वेद ) चतुश्लोकी भागवत का उपदेश प्रदान किया था।
( चूंकि इस कल्प में जगजननी भगवती श्री ललिताम्बा अपने हस्त कमल के नख़ से भगवान नारायण को प्रकट करके या यूं कहे कि भगवान नारायण रूप में स्वयं ही लीला कर रही है ) तो सर्वप्रथम ब्रह्मा जी को तत्व ज्ञान का उपदेश करने वाले सबके प्रथम गुरु अर्थात श्री आदिगुरू भगवान नारायण हुए, इसलिए आदिगुरु परंपरा इस कल्प में उन्हीं से प्रारम्भ होती है।

श्री आदिगुरु परंपरा:-

नारायणं पद्मभुवं वसिष्ठं शक्तिं च तत्पुत्रपराशरं च ।
*व्यासं शुकं गौडपदं महान्तं गोविन्दयोगीन्द्रमथास्य
शिष्यम्* ॥
*श्री शंकराचार्यमथास्य पद्मपादं च हस्तामलकं च
शिष्यम् । तं तोटकं वार्तिककारमन्यानस्मद्गुरून् संततमानतोऽस्मि*!!

सबसे पहले सतयुग में आदिगुरु भगवान नारायण के शिष्य ब्रह्मा जी हुए , फिर त्रेतायुग में वसिष्ठ जी, फिर शक्ति जी, फिर पराशर जी, फिर द्वापर युग में भगवान वेद व्यास जी, फिर शुकदेव जी, फिर गौड़पादाचार्य जी, फिर इनके शिष्य गोविन्दपादाचार्य जी और फिर इनके शिष्य आदि शंकराचार्य हुए। इस प्रकार आदिगुरु से प्रकट हुआ तत्व ज्ञान आदि शंकराचार्य तक पहुंचा। कलयुग में सनातन धर्म का पुनरुद्धार करने वाले जगतगुरू शंकराचार्य आदि गुरु कहलाए।

आदि शंकराचार्य :-

सनातन धर्म को सनातन बनाए रखने के लिए, धर्म की रक्षा अधर्म का नाश करने के लिए आदि शक्ति का समय समय पर अवतरण होता रहता है। कालांतर में जब धर्म का ह्रास होने लगा तो स्वयं भगवान शिव ज्ञानावतार के रूप में आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व केरल प्रदेश के कालड़ी नामक ग्राम में पिता शिवगुरु और भगवती माता आर्याम्बा के घर शंकर के नाम से अवतरित हुए। आठ वर्ष में समस्त वेदों के ज्ञाता शङ्कर ने गोविन्दपादाचार्य जी से संन्यास की दीक्षा ग्रहण की, संन्यास धारण कर बारह वर्ष की अवस्था तक सभी शास्त्रों का ज्ञान पाया और सोलह वर्ष की अवस्था तक उपनिषदों, भगवद्गीता तथा ब्रह्मसूत्रों पर शाङ्कर-भाष्य लिख दिया। पूरे देश की पदयात्रा की। शास्त्रार्थ के माध्यम से सनातन-सिद्धान्तों के विरोधी बहत्तर मतों को परास्त किया और पुनः सनातन वैदिक धर्म के अद्वैत सिद्धांत की पुर्नस्थापना की और आदि शंकराचार्य जगतगुरु शंकराचार्य जी कहलाए।

आचार्य ने स्वयं कहा है कि
*कृते विश्वगुरुर्ब्रह्मा त्रेतायामृषिसत्तम: ।
द्वापरे व्यास एव स्यात् कलावत्र भवाम्यहम्* ।।

सतयुग में ब्रह्मा, त्रेता में मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ, द्वापर मे वेदव्यास तथा कलयुग मे मैं (शंकराचार्य) ही जगद्गुरु हूँ।

इस प्रकार जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी महाराज ने भविष्य में भी सनातनधर्म का प्रचार होता रहे, इस आशय से चारों वेदों को आधार बनाकर देश की चार दिशाओं में चार आम्नाय मठों ( ज्योतिर्मठ, द्वारिका शारदा मठ, श्रृंगेरी शारदा मठ, गोवर्धन पुरी मठ) पीठों की स्थापना कर उन चार-पीठों पर अपने चार सुयोग्य शिष्यों को अभिषिक्त किया और अपने अनुयायियों को उन्हें शङ्कराचार्य ही समझने तथा तदनुरुप व्यवहार करने को कहा। तब से चारों पीठों पर चार शङ्कराचार्य अपने-अपने निर्धारित क्षेत्राधिकार में सनातनधर्म का संरक्षण करते हुए आ रहे हैं।
भगवान शंकराचार्य के शिवलोक गमन के पश्चात कालांतर में भगवान आदिगुरु नारायण के अंशावतार भी वैष्णव आचार्यों के रूप में प्रकट हुए जिनके द्वारा अन्य मठों पीठों और अन्य संप्रदायों की स्थापना हुई।

भगवान शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित ज्योतिष एवं द्वारिका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर अनंत श्री विभूषित श्रीमज्जगतगुरु शंकराचार्य स्वामिश्री: स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज सनातन धर्म के सूर्य के समान अपने दिव्य सानिध्य और ज्ञान से सनातन जगत को आलोकित कर रहे है। पूज्य महाराजश्री द्वारा सैकड़ों गुरुकुलो, गौशालाओं, मठ मंदिरों आश्रमों, चिकित्सालयों का निर्माण हुआ और करोड़ों शिष्यों को दीक्षित किया।
इसी महान गुरु परम्परा में पूज्य महाराज श्री जी द्वारा दीक्षित, आशीर्वाद से अभिश्निचित परम् कृपा प्राप्त प्रिय शिष्य आचार्य श्री प्रणव जी महाराज जो कि वर्तमान में श्री आदिगुरु पीठ सेवा न्यास के संस्थापकाचार्य परमाध्यक्ष के रूप में सनातन धर्म की सेवा में सतत निरत संलग्न है। जिनके मार्गदर्शन में श्री आदिगुरु पीठ द्वारा सेवा कार्य संपन्न किए जा रहे है।

श्री आदिगुरु पीठ / मठ :-
आदिगुरु का वह स्थान ( मठ ) जहां साधक साधन कर साधन संपन्न होते है, जहां विद्यार्थी साधनार्थी सद्गुरु के सानिध्य का लाभ प्राप्त करते है। आचार्य द्वारा आदिगुरु की शिक्षाओं दीक्षाओं को यथा अधिकार शिष्यों को प्रदान कर उनकी शंकाओं जिज्ञासाओं का समाधान कर उनके कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया जाता है आदिगुरु की शिक्षाओं सेवाओं को समर्पित यह आदिगुरु मठ है, जहां पीठस्थ आचार्य के द्वारा मठ के धर्मार्थ लोककल्याणकारी कार्यों को गति प्रदान की जाती है। इसलिए इसे श्री आदिगुरु पीठ भी कहा जाता है। मठ में आद्य शक्ति जगजननी अनंत कोटि ब्रह्मांड नायिका राज राजेश्वरी श्री माता श्री ललिता महात्रिपुर सुंदरी स्वयं अपनी शक्तियों सहित विराजमान है यहां भगवती सती के केश निपात हुए थे इसलिए यह केश शक्ति पीठ भी है अत: श्री आदिगुरु मठ के शक्ति समन्वित होने से भी इसे श्री आदिगुरु पीठ कहा जाता है।

श्री आदिगुरु पीठ की आराध्या:-
श्री आदिगुरु मठ में स्मार्त परम्परा अनुसार शास्त्रोक्त पंचदेवो उपासना सहित आगम निगम संबंधित साधनाएं होती है। परमराध्या के रूप में भगवान की भी आराध्या अनंत कोटि ब्रह्मांड नायिका राज राजेश्वरी श्री माता ललिता महात्रिपुरसुंदरी की आराधना होती है।

श्री आदिगुरु पीठ का ध्वज :-
श्रीमद् भागवत पुराण के अनुसार वृषभ को धर्म का स्वरूप माना गया है अतः श्वेत वस्त्र पर स्वस्तिकप्रणव युक्त वृषभ अंकित ध्वज, पीठ का मूल ध्वज है। यही सनातन धर्म ध्वज है।

श्री आदिगुरु पीठ का सिद्धांत:-

अद्वैतवाद सिद्धांत है चूंकि यही वेद उपनिषदों का सिद्धांत है।
"सर्व खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन"
छांदोग्य उपनिषद्
" सब ब्रह्म है, इसके अलावा और कुछ नहीं है।"
और वह ब्रह्म तत्वमसि - वह तू है।

ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है ये नष्ट होने वाला है, अज्ञान के कारण ही ये सत्य भाषित होता है। इसी अज्ञान के कारण ब्रह्म आत्म तत्व बोध प्राप्त नहीं होता, इस अज्ञान से मुक्ति ज्ञान से ही संभव है।
"ऋते ज्ञानात् न मुक्ति" "ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं है।"
जो ज्ञानी है उसी की पूर्ण मुक्ति संभव है। फिर क्या भक्त की नहीं होगी ?
भक्तों को लिए मुक्ति का ये क्रम - भक्त पहले भक्ति करेगा फिर ईश्वर प्रसन्न होगा वह जब मुक्ति देना चाहेगा तो ज्ञान प्रदान करेगा या करवाएगा। इस प्रकार भक्ति का मूल फल ज्ञान प्राप्ति और फिर ज्ञान से मुक्ति।

ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्‌ गीता ७.१८
भगवान श्री कृष्ण कहते जो ज्ञानी है वह तो साक्षात मेरा ही स्वरूप है। अर्थात वह ब्रह्म ही है। इसी सिद्धांत को पीठ स्वीकार करती है। अन्य आचार्यों द्वारा स्थापित सिद्धांतों का सम्मान करते हुए, अद्वैत सिद्धांत को प्रमुखता से स्वीकार किया जाता है।

श्री आदिगुरु पीठ के विभाग:- सेवा कार्य :-
श्री आदिगुरु पीठ के उद्देश्य और सेवा कार्य निम्न विभागों में निहित है।
साधना विभाग, शिक्षा विभाग, चिकित्सा विभाग, असहाय सेवा विभाग, गौ सेवा विभाग, पवित्र उत्पाद विभाग, ज्योतिष विभाग और धर्म खाता विभाग

पीठ के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु श्री आदिगुरु पीठ सेवा न्यास नामक धर्मार्थ लोककल्याणकारी संस्था की स्थापना की गई है। जिसमें आप सहभागी बन कर पुण्य प्राप्त कर सकते है।

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